मेरी जान के हकदार हो तो सुन लो

ये खत है उस गुलदान के नाम
जिसका फूल कभी हमारा था

वो जो अब तुम उसके मुख्तार हो 
तो सून लो
उसे अच्छा नही लगता

मेरी जान के हक़दार हो तो सुन लो
उसे अच्छा नहीं लगता

कि वो कभी जब ज़ुल्फ़ बिखेरे तो
बिखरी ना  समझना
अगर जो माथे पे आ जाए तो 
बेफिक्रि ना समझना

दरअसल उसे ऐसे ही पसंद है
उसकी खुली ज़ुल्फ़ों में उसकी आजादी बंद है

जानते  हो…
वो अगर हज़ार बार जुल्फें ना  संवारे
तो उसका गुज़ारा नहीं होता
वैसे दिल बहुत साफ़ है उसका
इन हरकतों में कोई इशारा नहीं होता

खुदा के वास्ते उसे कभी टोक ना देना
उसकी आज़ादी से उसे कभी रोक ना देना

क्योकि अब मैं नहीं तुम उसके दिलदार हो 
तो सुन लो
उसे अच्छा नहीं लगता।

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