चंदा – The Absolute/Pure Desire

तन्हा यह सब कोई है, ये हो नहीं सकता के कोई तन्हा न हो। आज तन्हाई की बात चन्ना मेरेया करके की जाती है। दरअसल चन्ना क्या है? कर्म तन्हाई से निकलता है। प्रेम चंदा से निकलता है। यू समजलों तन्हाई और चंदा दो बहने है। ये बात मजेदार है। कर्म और तनहाई माया स्वरूप है। प्रेम और चंदा योगमाया स्वरूप। आम आदमी अपनी जिंदगी तनहाई मे जी लेता है, माया के लपेटे मे, कर्मों से बंधा हुआ। मगर अगर कोई माई का लाल, अगर अतिक्रमण कर गया, बुद्ध बन गया, तो वो ही तन्हाई चंदा बन जाती है। चंदा का मतलब है – Absolute/Pure Desire जो प्रेम बनकर अभीव्यक्त होती है। क्युकी यहा (इदं) सब कुछ माया स्वरूप है, इसलिए ये चंदा (Desire) किसी भी के लिए हो ही नहीं सकती (चंदा योगमाया स्वरूप है) । चंदा सिर्फ हो सकती है उसके लिए जो यहा पे नहीं है, कहीं नहीं। सा तू अस्मिन परम प्रेम रूपा। नारद भी नहीं कह पाते की अस्मिन कोन है, जिसके लिए भक्ति हो। किसके लिए चंदा? कोन है जो कहीं नहीं? गजब है ना। चंदा मेरेया, My Desire। What is that? For Whom? नामुमकिन है कहना की किसकी Desire है। ये कुछ ऐसी Desire है। चंदा मेरेया बनता है चन्ना मेरेया। अब जब भी वो गीत जुबान पे आए, तो याद रखना वो किसी चीज ना मिलने पर तनहाई से निकली बात नहीं जो कैद कर ले तुम्हें, पर दरअसल वो एसी Desire है जिसका जवाब नहीं, जिसके लिए है उसका जवाब नहीं। नाम लेने के लिए कह सकते है कृष्ण, पर वो फिर माया के दायरे मे या जाता है, जिसे अपरा भक्ति, कहते है। अगर Desire का अवलंबन कहीं पर भी ना हो, तब ये छलक के सभी पर होती है। गजब है ना। चन्ना मेरेया और हजारों ख्वाहिशे ऐसी, दोनों एक ही है, बस थोड़ा सा फरक है। असद अगर बुद्ध बनते तो वो चन्ना मेरेया लिखते। गौतम अगर बुद्ध न बनते तो हजारों ख्वाहिशे लिखते। असद वो गौतम था जो बुद्ध बनने में चूकते चूकते आखिर ग़ालिब बन गया। अगर चुकता नहीं तो शायद रूमी से बड़ा नाम होता। खैर गौतम कहते है चंदा, असद कहते है ख्वाहिश। चंदा बन गया चन्ना, और चन्ना का असली मतलब मीट गया, चन्ना का मतलब बन गया आम ख्वाहिश जिसपे दम निकल सकता हो, वही मिर्जा वाली ख्वाहिश। मोटे तौर पे अगर फिर भी समझना हो की चंदा कैसी होती है, तो जैसे गोपी पानी भरते हुए भी कान्हा के बारे मे ही सोचती है बात करती है, कान्हा वहा है ही नहीं, कान्हा किसी गोपी का नहीं है, फिर भी गोपी कान्हा के ही बारे मे सोचती है, कान्हा छेड़ दे वही ख्वाहिश, जब की कान्हा गोपी का है ही नहीं और पानी भरते कान्हा मौजूद भी नहीं है। वो जो कान्हा छुप जाता है किसीके हाथ नहीं आता, वो कान्हा है गोपी का चंदा, गोपी का चन्ना। गोपी अगर गाती कान्हा के लिए, तो वो वाजिब तौर पे होता “चन्ना मेरेया”। वाह रूमानी हो गया ये तो। है ना मजेदार। राज़ तो है बहोत सारे है यहा।

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