
नाम बदल दिए गए है
शुक्रवार दोपहर दो बजे बस में सफर शुरू होता है, श्री श्री रविशंकर के वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल में हिस्सा लेने के लिए। में बैठा हु आखरी सीट पे, अपने ही मजे में। उमंग है वाशिंगटन पहोचने की । रास्ता कट रहा है मजे से । शाम के 6 बजे बस पहुचती है वाशिंगटन। उतरके में देखता हु घोड़े पे सवार पुलिस और हजारों को भीड़ में दुनियाभर के लोग। कुछ देर टहलते टहलते मेरी नजर पड़ती है स्क्रीन के ऊपर, भाषण देते हुए जयशंकर पे। जयशंकर को देखते पता नहीं क्या जादू छा जाता है। मुझे अब कहीं समझ मे आता है की ये बड़ी ईवेंट है। अच्छा लगता है। समोसा, चाट, भेल और पकोड़े की डकार लेके टहलते टहलते 10 बज जाते है। और वापस आकर एंबेस्सी सूट में अप्पन आराम फर्मा रहे है । करीब 11 बजे है , रात के। आज का दिन अच्छा गया। लेकिन तब भी कुछ मिसिंग था । एक कॉल लगाया अप्पन ने। और फिर कहानी शुरू हुई एक यादगार शाम की जिसकी मेने कल्पना नहीं की थी। वो एक दोस्त को कीये हुए रेंडम कॉल ने बाकी दो दोन की कहानी ही बदल दी थी।
शनिवार सुबह 11 बजे, उठने का मन ही नहीं था। लेकिन 11 बज गए थे। कल बात हो चुकी थी रात को ग्यारह बजे, विकास से, एक मित्र जिससे कुछ साल पहले एक रेंडम मुलाकात हुई थी। और कहीं कनेक्ट हो चुका था। अपेक्षा नहीं थी की जनाब टेक्सास से वाशिंगटन पधारे होंगे। क्युकी पिछले सालसे लग नहीं रहे थे इनके लक्षण। पर फिर भी दिल नहीं मान रहा था। शुक्रवार कुछ कमी लग ही रही थी। कुछ मिसिंग हो जैसे। रात को सोने से पहले कॉल हुआ विकास को। पूछा कहा हो, क्या कर रहे हो? उम्मीद थी की जवाब मिलेगा की टेक्सास में कुछ ऑफिस वर्क कर रहे है। लेकिन, खुदा को मंजूर और ही कुछ था। भाई साहब वाशिंगटन मे ही थे। शनिवार सुबह मिलने की बात हो गई। अप्पन को थोड़ा स होप बढ़ गया, की अब धमाल हो सकती है। आज शनिवार सुबह के 11 बज गए है। बिस्तर से निकले, अप्पन मस्त नहाए। 12 बजे बस जाने वाली थी। अप्पन पहोचए 1230 वेन्यू पे । एंट्री मारते ही विकास को कॉल लगाया। 10 मिनिट लगे, और एक बावला, जिसने दाढ़ी नहीं की, गले में हरा झोला लटका है, बाल घुंगराले है, कंगी करने की जरूरत नहीं, जब्बे के ऊपर पर्पल कलर का वालन्टीर टी शर्ट xxl साइज़ का है, जूते कपड़ों से मैच नहीं हो रहे। हाथ में बैनर है, वालन्टीर का। भाई साहब सबको हेल्प करने मे लगे है। मिल गए अप्पन को इसी हालत में, पर इनके अंदर जैसे गार्डन भरा पड़ा है, बागीचा। में पूछना चाह रहा था, की दादा ऐसी हालत क्यू बना रखी है, पर उससे पहले, मुझे दोस्त से 2 साल बाद मिलने के बहाव ने सब भुला दिया। जैसे आँखों में चमक आ गई। कुछ गप शप हुई । सोचा कुछ खा लेते है। अप्पन ने कायदे से भाई को बिल फड़वाया, इतना तो बनता है एसा सोचके। खाना लेके लोन में बैठे ही थे, मिर्ची पकोड़े का मजा लूट ही रहे थे की, हवाएं ऐसे बदल गई , जैसे हुमने तूफान देख लिया।
कहानी १
मोहतरमा का नाम था हसीता शाह, लेकिन नाम जानते जानते एक घंटा लग गया था। पहले तो नाम वाम छोड़ो। हमने देखा काले काले बादल छाए हुए है। गरज रहे है, और तेज, और तेज। ऐसा लगता है बस बरसने ही वाले हो इसी पल, और हम दोनों घबरा रहे है। जैसे “रोकलों कोई”। हसीता मैडम बावली के जैसे पास आ चुकी है, और बस उनकी आँखों में गहने बादल, बस अभी फट के रोना शुरू करेगी तब बारिश की तरह बरसेंगे ऐसा लग रहा है। अप्पन के मुहमे आधा मिर्ची का भाजिया रह गया, बाकी का आधा मिर्ची का भाजिया अप्पन ने वापिस रख दिया प्लेट मे। प्रायोरिटीस बदल चुकी थी। विकास के अचानक मिल जाने की खुशी, अब खत्म हो रही थी। मेडम गुज़्जु थी, अपना फर्ज बनता है बिल्कुल। कुछ कुछ समझ में आ रहा था, की वो कनाडा से है, और उनका फोन घूम गया है, उसमे पैसा, होटल की चाबी, आइडी कार्ड सब था। मैने और विकास ने 15 मिनट लगा दिए थे, लोन को छान मारा। पिंक फोन कही नहीं मिला। हसीता का हाल ऐसा था जैसे बच्चा खो गया हो उनका, इतनी बावली। बिल्कुल जैसे पागल ही हो चुकी एक तरह से। कैसे वापस जाएगी? कैसे होटल जाएगी? कैसे कनाडा जाएगी? पैसा भी नहीं है! क्रेडिट कार्ड नहीं है! अब क्या होगा? और उनसे ज्यादा हम दो टेंशन में। वालन्टीर का फैल्यर होगा ये तो। हमने जान लगाना शुरू की। विकास फोन पे मेडम के हज़्बन्ड से बात करते करते फोन ट्रेक करने में लग गया। और मेडम ने मेरा हाथ पकड़ के बोला मेरेको मत छोड़ना अभी, अप्पन को समज में आ गया, अब मामला सिरियस है। ठीक है कोई बात नहीं। में मेडम को ले गया घोड़े पे बैठे शानदार पुलिस अफसर के पास। पूरी कहानी बताई। पुलिस तैयार हो गई मदद करने, हमारे साथ घोडा चलता चलता आया, उस जगह पे जहा फोन ट्रेक किया जा चुका है। बीच में अप्पन ने हर बूथ पे अपना फोन नंबर दे डाला, की अगर फोन मिल जाए तो कृपया मेरेको कॉल करे, मोहतरमा मेरे साथ है, फोन उन्ही का है, (अगर पिंक है तो)। बहोत जान लगाई, पुलिस को बोला अनाउन्स करो, मना किया। wcf के बंदों को बोला अनाउन्स करो, मना किया। ऑप्शन कम बच रहे थे। हम उसी जगह पे बैठे थे जहा फोन ट्रेक हो रहा था। हसीता उनकी फ्रेंड के सामने रोने लगि थी। हम दोनों का मानना था के, सब कुछ कर चुके है। हम लोगों ने जान लगा दी थी, चल चल के, लगातार फोन पे, पुलिस के साथ, वालन्टीर के साथ, हर बूथ पे। इनके हसबंड लगातार डेड घंटे से फोन पे है, बात नहीं बन रही। मैने एक ऑप्शन निकाला। मेर बेटी का फोन, मैने सोचा टेम्पररी उनको देता हु, ताकि वो जब तक चाहे मेरी बेटी के फोन से अपना फोन ट्रेक कर पाए। और अपने हज़्बन्ड को फोन पे रो रो के परेशान कर पाए। ईमर्जन्सी में मेरी बेटी जो फिलाडेल्फ़िया मे थी, उसको कॉल लगाया गया, इन 10 साल की महोतरमा को रेकुएस्ट किया गया के हमे हमारे मिशन में हेल्प करे। और मेरी जान ने मेरी आवाज सुनते ही अपना सीक्रेट पासवर्ड डैडी को दे दिया ताकि डेड़ी अपनी एक फ्रेंड को मदद कर पाए। डैडी ने अपनी नन्ही ऐन्जल का शुक्रिया भी किया। वापस आते है हसीता मेडम पे। मेडम चोली में आई है गरबा के लिए, और में सोच रहा है, इस हालत में कैसे करेगी गरबा और कैसे याद रखेगी wcf को। उनको रोता देखके में गया दो बोतल पानी लेने, मेरेको भी धूप मे चल चल के प्यास लग रही थी। में पानी लेके वापस आया, तब मेडम और विकास निकाल चुके थे आखरी खोज के लिए, फिरसे लोन में, एक बार और, फोन की तलाश के लिए। में भी बोतल लेके वहा पहुचा। खोजा खोजा खूब खोजा। नहीं मिला। किसी दूसरी लेडी का पिंक फोन देखते एक बार तो मन किया उनसे पूछू, की ये आपका ही फोन है ना? पर ऐसा लगा गाली पड़ सकती है, तो में रुका हुआ था। आखरी ऑप्शन वही था, की सभी पिंक फोन वाली को पूछा जाए, ये कही आपको लावारिस मिला तो नहीं? अभी भी हम खोजे जा रहे थे, खोजे जा रहे थे। इतने में मुझे एक कॉल आया, और ये कॉल केनडा से नहीं था। वाशिंगटन से था। शोर और हल्ला गुला में मैं ठीक से समझ नहीं पाया, पर कोई अंग्रेज बोल रही थी की आपने अपना फोन नंबर दिया था इसलिए में कॉल कर रही हु। अप्पन की लाइट जल गई, के ये किसी बूथ से कॉल है, फोन मिल गया। मेरा दिमाग काम करना बंद हो चुका था, मेने तुरंत फोन मेडम को दिया, कहा आप कन्फर्म करो क्या बोल रही है अंग्रेज। मेडम पागल हो बैठी, चाल में उछाल आने लगा, मुझे बोली तुम्हारा कैसे धन्यवाद करू, तुम ऐन्जल हो। अप्पन अंदर डर रहे थे, क्युकी पोसीबीलीटि थी की जो फोन मिल वो उनका नहीं दूसरे किसीका था। लेकिन अप्पन ने मेडम की खुशी को बहने दिया कूदते कूदते कब बूथ आ गया पता ही नहीं चला। और फिर से मेडम की आँखों मे आँसू, जैसे बच्चा वापस मिल गया हो वेसे, हर्ष के आँसू। में और विकास ये मधुर मिलन हसीता और उनके पिंक फोन का मिलन देखके ऑल्मोस्ट रो दिए थे। इन्होंने दोनों ऐन्जल को समोसा चाट, पकोड़े खिलाए। और बस बोले जा रही है में आप दोनों की शादी करवा दूँगी, कनाडा आना तो जरूर आना, हम दोनों का नंबर ले लिया गया। एक फोटो भी लिया मेडम ने, जिसमे वो हम दोनों के पीछे जागे, एकदम जैसे कोई बड़ी दीदी दो भाइयों को दबोचके पिक्चर खिचवाती हो वैसे खिचवाया। फिर 20 मिनट की बातों के बाद कहीं बात खतम होते होते खतम हुई। चलते चलते मजाक मजाक में दो बाते हो गई। मेने मजाक मे हसीता को बताया, हमे दरअसल उनके हसबंड की फिक्र थी, की अगर फोन नहीं मिला तो, कहीं न कहीं गलती तो उसी बिचारे हज़्बन्ड की निकलेगी जो wcf में आया ही नहीं था, ये Canonical Truth था, जैसे बुद्ध के चार Truth है, वैसे ये पाँचवा truth था। तो हमने यहा जान इसलिए लगा दी थी, हमने एक हज़्बन्ड की बैंड बजते कल्पना कर ली थी। खैर ये एक मजाक था, शायद हसीता को समज मे आ गया था की में क्या कटाक्ष कर रहा हु। उसने हामी भरी, की सचमे शायद ऐसा ही होता, लेकिन ये बताते उनके चेहरे पे मुस्कुराहट थी। में खुश था, दवाई का सही असर देखके। और दुसरी बात ये थी, की हसिता ने हमको बताया, की उसके हज़्बन्ड ने उनसे कहा की आज मुझे मेरा बच्चा वापस मिल गया, हज़्बन्ड ने बीवी को 10-15 साल के बाद रोते हुए, पूरी शिद्दत से ये बताया था की, तुम कुछ भी करके हेल्प करो, मेरी गलती हो गई है, मेरेसे फोन घूम गया है, मुझे इसमे से तुम बाहर निकालो कुछ भी करके। ये जानके हज़्बन्ड को शायद भरोसा हो गया था अब भी वो किसी तो काम के है, और भरोसेमंद है, अपनी बीवी के लिए। चाहे 10 साल के बाद भी सही। और बीवी के आँसू हज़्बन्ड के सामने.. हाय.. मुझे लगता है उस दिन उनका हज़्बन्ड जान भी लगा देता अगर जरूरत पड़ी होती। ऐसा मौका उनकी लाइफ में 10 साल के बाद आया था। मौके का उन्होंने खूब फायदा उठाया, और लगातार फोन पे डटे रहे थे। ये बताते हुए भी मेडम की आँखों मे नमी और चेहरे पे मुस्कान थी। उनको कुछ चीजें ऐसी समज मे आ गई थी जो यहाँ लिखना मुश्किल है। हमारे पैर सूझ रहे थे, मेडम ने बिदा ली, और हमने लोन में पैरों को आराम दिए। जो तांडव पिछले तीन घंटे चला, उसे में, विकास, और हसीता शायद ही जिंदगी में भूल पाएगे। उनके हज़्बन्ड ने हमे शुक्रिया मेसेज किया, और दोपहेर की ग़र्मी शाम का रंग लेने लग रही थी। पहला किस्सा खत्म हुआ था। लेकिन दूसरा शुरू होने ही वाला था बस।
कहानी २
ढलते ढलते शाम अपनी गरिमा में आ रही थी। अप्पन गुज़्जु कड़के। जनरल एडमिससन टिकट पे आए थे। दूर लोन मे बैठके बड़े स्क्रीन पे ईवेंट देखना था। आगे बेठने के लेवेल्स कलर कोडिंग मे थे, ऑरेंज 1000 डॉलर, ब्रान्ज़ 10000 डॉलर, सिल्वर 25000 डॉलर, गोल्ड zzz डॉलर। जैसे बुर्ज खलीफा की किसी रेस्टोरण्ट का मेनू कार्ड हो, हमारे होश गुल थे। लेकिन जज्बा बड़ा था। विकास के पास ऑरेंज बैंड था। फेमिली पास। पहले ही दो लड़कियों के लिए और एक आंटी के लिए बैंड ले चुका था (शायद उसकी मजबूरी रही होगी, या फिर कमजोरी ;))। पर फिर भी, भाई का होसला बुलंद, फॅमिली पास बोलके हम पहले गेट को पार कर लिए, मेरे हाथों मे कोई भी बैंड नहीं था, पर जुगाड़ चल गया, हम जनरल सीटींग मे पहोच गए, चेर पे बैठ सकते थे। अब कीड़ा था, ऑरेंज सीटींग मे सबको सेट करने का। मधू जाँबाज पॉलिसींग कर रहे थे। जैसे ही उनको पता चला की मेरे पास बैंड नहीं है, उन्होंने लक्ष्मण रेखा खींच दी, नहीं जा सकते, बस। अब लोग पाँच थे, और ऑरेंज बैंड पे एडमिसन चार। विकास फिर भी पोसीटिव था। फाइट कीये, पर मधू फ़ाइरिंग पे थे। उनको मनाना मुश्किल था। मुझे लगा मेरेको सैक्रफाइस करना पड़ेगा। इतने में आंटी ने मुझे ऑरेंज बैंड दे दिया। उन्होंने बलिदान दे दिया, कहा आप लोग जाओ ऑरेंज सीटींग मे। कुछ बेक एंड फ़ोर्थ के बाद, आखिर मेने बैंड ले बिना किसी शर्म के ले ही लिया। लेकिन में और विकास भी गर्मी मे आ गए थे, वापस गए, टिकेटिंग बूथ पे। फिर से बताया ईमेल, और की माथापच्ची। कहीं जाके 15 मिनट के बाद दूसरे दो ऑरेंज बैंड लेके आए। तब गुज़्जु और बिहारी दोनों के कलेजों को ठंडक पहोचि, अब एसा फिल हो रहा था की हम असली देसी है, चार लोगों के रजीस्ट्रेसन पे छे बैंड लेके आए। छाती चौड़ी थी अब। वापस आते एक अंकल मिल गए, पहचान के, उनको एक बैंड दे दिया गया, उनको लेके अप्पन ऑरेंज एरिया मे शेर की तरह घुसे। अच्छा लग रहा था, स्टेज से करीब आ रहे थे। ऐसा लग रहा था की अब वीआईपी वाला 10 पर्सेंट फीलिंग आ गया था, बिना किसी खर्चे के। सीट खोजी, विकास की दो कमजोरियाँ वही पे बेठी थी, और मे और विकास भी बेठे थे। इतने मे गरबा डांस शुरू हुआ। हमने मजे से गरबा किया । दिन वसूल हो चुका था, गुज़्जु दिल ठंडा हो गया डांस कर के। लेकिन आगे जो हुआ वो मेने या विकास ने सोचा नहीं था। मैने सोचा था की विकास अपनी कमजोरी के साथ सट के बेठके बातें करता रहेगा, और मुझे उसको प्राइवेसी देनी पड़ेगी। में ईवेंट देखने में मशगूल हो ही रहा था की.. मेरे दीमाग मे घंटी बजी। एक बार फिर से Bronz एरिया में जानेका कीड़ा बड़ी जोर से लग रहा था। हमेशा की तरह अप्पन ने कीड़ा विकास को बताया। और एक पागल आदमी दूसरे पागल आदमी का आइडिया मना नहीं करता, ठीक वैसे, भाई खड़ा हो गया, कमजोरी भूलके, उसके अंदर का बिहारी जाग उठा। एक महोतरमा को हम अपने झोले और बेकपेक, और विकास का फोन सौंप के निकाल लिए, एक और ट्राइ मारने। अप्पन आईआईटी इलाहाबाद से है, और भी आईआईटी खड़गपुर से ये हम दोनों, अपने पागलपन में कही भूल चुके थे। हम ऑरेंज पास बताके Bronz एरिया में फिर से एक बार जाने का चांस ले रहे थे। लेकिन बात बन नहीं रही थी। इतने मे चमत्कार हो गया। आईआईटी खड़गपुर का सीनियर। विकास को उसके गलते मिलते ही, में समज गया, फोड़ दिया है। सीनियर बंधु ने खोपचे मे लेकेर मेरेको बताया की मौका मिलते है, वो उसके पीछे से हमको छुपाके bronz एरिया में घुसने देगा चुपके से। बताया 2 मीनट चक्कर लगाके आओ, तब तक वो तामझाम कर लेगा, अंजाम के लिए। अप्पन विकास को बताए घटना के बारे मे। पागल हो रहे थे हम दोनों। आखिर आईआईटी का सीनियर सीनियर होता है, बात तो है। 2 मीन से पहले ही सीनियर ने अंदर घुसा दिया, वो ही चेक किया ऑरेंज बैंड, और प्रमाणित कर दिया की वो सिल्वर बैंड है। ये सिर्फ पहले भारत मे पॉसिबल था, अब वाशिंगटन में इसके साक्षात्कार से हम दोनों मुग्ध थे। बहुत खुश थे। देसी जुगाड़ वो भी आईआईटी वाला, भाई ये गुजजु मिठाई से भी ज्यादा मीठा लग रहा था। खैर, अंदर घुसते है, कूदते दौड़ते आगे जा रहे थे, विकास को डांस आता है, वो कही डांस करने लगा, तब मेने उसको मंजील आगे है करके डांस मे बहने से दूर रखा। फिर से दौड़ कूद के साथ bronz के आगे का पर्पल और उसके आगे का सिल्वर एरिया पार किया, बाउंडरी नहीं थी। अप्पन आजाद थे, बिना टिकट के सिल्वर एरिया में घुस के भगवान की ग्रेस ही फिल हो रही थी। आम तौर पे यहा पहोचने का तरीका एक ही होता है, 10000 usd, दस हजार डॉलर। इसके आगे 25 हजार डॉलर वाला एरिया था, लेकिन वहा बहोत ज्यादा सिक्युरिटी थी, और हम दोनों ने सोचा ये थोड़ा ज्यादा ग्रीडी हो जाएगा, और बुद्ध ने बोला है लोभ नहीं करनेका। तो हम यहा डांस करने लगे। भाई भांगड़ा पागलों की तरह कर रहा है। पेरफोरमर्स सामने करीब से दिख रहे है, स्क्रीन पे देखने की जरूरत नहीं बची। इतने करीब थे। ये दो सनकी पागलों की रोमांचक जीत थी, सिल्वर एरिया मे डांस करना, जहां शायद बड़े ही लोग थे, मैने कुछ डॉक्टर, कुछ डायरेक्टर जिनको में जानता हु उनको देखा, एक दो से हाय हैलो हुआ। शयद उनके लिए पचा पाना मुश्किल था की में कैसे वहा उस एरिया मे। लेकिन कुछ भी कहो, अप्पन को बड़ा मजा आ रहा था। थोड़ी देर मे मेडिटेसन शुरू हुआ, मेने भाई को जमीन पे बैठे देखा। कमाल था, आईआईटी खड़गपुर का बंदा लेकिन ईगो रत्ती भर नहीं था। में भी जमीन पे बैठा मेडिटेसन किया। नौ बज रहे थे। मिशन खत्म हो चुका था, मिशन bronz खत्म हुआ था सिल्वर एरिया से। खुशी से उछल उछल के वापस जा रहे थे। क्युकी वहा हमारे झोले और बेकपेक उन दो कमजोरियों के साथ हमारा वेट कर रहे थे। एसा लग रहा था की दोनों मोहतरमा को हमारी जाँबाज करतूत के बारे में बढ़िया किस्से सुनाएंगे, रोला काटेंगे, किस्से बनाएंगे। पर एक ट्विस्ट आ गया। जैसे ही वापस ऑरेंज एरिया मे पहोचे और खोज ही रहे थे कहा है दोनों, वैसे ही एक आवाज आई, एक मेडक, सॉरी, एक मेडम गुस्सा हो गई थी, मैने उनको बोला की आखिर का 2 घंटा हम सिल्वर एरिया में घुस चुके थे इसलिए वापिस नहीं आ पाए, मेरे बोलनेके खतम होने से पहेले ही, दोनों मेडम खड़ी हुई, और हम दोनों को जो लताड़ लगाई, सब सन्न, बगल में पचासों लोगों के बीच में, मेडेमने चिल्लाके बोला की, हम लोग तुम्हारे झोले को और बेकपेक को संभालके रखने के लिए यहा नहीं बेठी थी। फिर कभी एसा बचकाना पागलपन करने से पहले सोचने की सलाह दी गई। अप्पन ने भाई को बोला, की लड़की को अटेन्शन नहीं देने का नतीजा यही होता है, फिर भी खुश तो हम थे, की आखिर दोनों ने हमारे झोले और बेकपेक संभाल के रखे थे दो घंटे तक, बस थोड़ी सी इज्जत का फ़लूदा कर दिया था हमारा सबके सामने, पर यहा किसको फिकर नहीं थी, इस फालूदे के सामने सिल्वर एरिया का सुख हमे इनके एब्यूस और जुल्म को सहन करने ताकत दे ही रहा था। दोनों एक मोमेंट खड़ी भी नहीं रही, तन तन करके निकली, और हमे एक्सपलेन करने का मौका भी ना मिला। अपने अपने झोले लेके और बेकपेक लेके में चेक किया की कही गुस्से मे मेडम ने मेरे पावरबेंक को कहीं तोड़ फोड़ तो नहीं दिया था। सब सलामत निकला। शुक्र है भगवान का, क्युकी गुस्से से तो ऐसे लग रहा था कुछ तो तोड़फोड़ हुई होगी। फिर भी, इस टाइप के जंग भाई ने और मैने, दोनों ने कई बार अपनी अपनी लाइफ में झेल लिए है, भूतकाल में, तो हमको घंटा फरक पड़ा। हम हमारी कामयाबी के जश्न में असुर की भांति मदमस्त थे, 10 बज रहे थे सक्सेस का नशा चड़ा हुआ था। मेरी बस 10 बजे थी, आज का पिलान था की इसी सक्सेस के साथ एम्बेसी होटल में चेन की नींद सोया जाएगा । ऐसे दूसरा किस्सा खत्म हुआ और दिन भी। पर एक बार और खुदा को ये मंजूर नहीं था।
कहानी ३
अप्पन बस तैयारी कर रहे थे की, खाना खा लिया जाए, जबतक बस का टाइम हो जाए। में और भाई दोनों खाने बैठे, वालन्टीर केलिए बढ़िया खाने का इंतेजाम था। दो बोक्सेस भर के डकार तक खाना खाया। और भाई ने एक ख्वाहिश बताई। घुमा जाए। सामने मोनुमेन्ट पीछे था इंडिपेंडन्स मोल। रात के करीब 10 बजे थे, साफ आसमान, चाँद, काफी सारे लोग, बढ़िया माहोल था। अप्पन ने मेसेज किया बस ग्रुप मे, 11 बजे चला जाए, तब तक रहेम हो, इजाजत हो घूमने की। लेकिन कुछ डिसप्लिन वाले तत्वों ने रहम नहीं बरसाया। गुज़्जु ही थी लीडर, पर एक ना सुनी। अप्पन ने मन बनाया और बस को अलविदा बोला, पिलान बन चुका था, ट्रेन से जाने का, 12 बजे, दो घंटा लुत्फ उठाएंगे डीसी का, ये सोचके। इतने मे एक और बंधु का कॉल आया, उसको भी घूमना था, मेरे दिए गए होसले से, उसने भी शेर की छाती निकालके बस को जाने दिया। भाई और मे एक ही ट्रेन मे जा सकते थे, उसका स्टॉप पहले था, मेरा बादमे। मस्त मजे से घूमना शुरू हुआ। चाँदनी थी, फलाफल आधा आधा करके, खाते खाते टहलते टहलते इंडिपेंडेंस मोल जा रहे थे। ढेर सारी बाते हो रही थी। मोल पे एक स्टैचू जो की तालाब से सटके है, वहा हमे राजाओ जैसा फ़ील हो रहा था। वही पे अड्डा जमाया गया। लेट के आसमान को देखते देखते बाते चल रही थी, खुश तो काफी थे आज कुछ किक मिल रहा था, वो जो कुछ महीनों से शायद मिसिंग था। भाई खुश था मुजसे 2 साल के बाद में अचानक मिलके, में भी खुश था भाई से मिलके, पर्सनल भी बाते हो रही थी, खुलके। इतने में फोन आ गया, एंट्री हो रही थी लंबू अमित भाई की, हालाकी वोभी लखनव से है। अभी तक इनको जानने का मौका नहीं मिला था। आज सही माहोल भी था। मैने थोड़ा अमित को छेड़ा। शायद में उनको जो समज रहा था वो गलत था। आज अमित का साक्षात्कार होने वाला था हमे। 11 बज रहे थे। तीनों लेटे हुए है, सामने शांत क्लीन तालाब, और तालाब में मोनुमेन्ट की इल्लुजन , और तालाब के ऊपर मोमेनेन्ट, उसके ऊपर बहोत बड़ा खुला आसमान, और तीन 21 वी सदी के कसे हुए और फसे हुए दिल दिमाग, एक दूसरे से खुलके आजाद बातें करने लगे। मुद्दा था सेन्सिटिव। फेमिनिज़म, और वुमन एमपवारमेंट के युग में चालाक लड़कियों के सामने आजके युवा की कठिनाइया, और जेन्डर गेप की वजह से आजके युवा की मा बाप के सामने दबी हुई हालत, और युवाओ के लिए किटी पार्टी के इंतेजाम न होना। में और विकास इन चीजों को आइडेनफाइ कर चुके थे। पर आज अमित का भी अंदाज देखके मजा आ रहा था। वो ऐक्टिंग कर कर के बता रहे थे की चाचा फूफा पड़ोसी का क्या कहर है उनके घर मे आग लगाने के मामले मे। कैसे मा से बात होती है। कैसे पिताजी से बहस होती है। कैसे एक सही सुलटे दिमाग को भी हर जवाब मोड के इस तरह देना पड़ता है जिस तरह पिताजी समज पाए। कुतियापा न चाहते भी करना पड़ता है। मेहनती सुलझा हुआ आदमी भी परेशान हो जाता है इन्ही चक्करों मे। उनकी हरेक एक्टिंग पे हमे उनके पेन की गहराई समझ आ रही थी । आगे चलते कही उनके ब्रेकप की बात निकली, विकास के ब्रेकप की, मेरे संसार के बिखरने की भी, मेरी बेटी की फाइट की। लेकिन ये सब दोस्तों के बीच में निकल रही थी, शायद यही दोस्त एक दूसरे के लिए वो बन रहे थे, जो इनके माबाप न बन पाए, भरोसेमंद इत्मीनान से सुनने वाले समझनेवाले फ़ील करने वाले कोई अपने। में विकास से कुछ भी बोल सकता था कभी भी। वैस ही वो भी मुझसे। लेकिन आज अमित भी बोल रहे थे, खुल के ऐक्टिंग कर कर के, अपनी स्ट्रगल, अपनी कहानी, दिल के हर कोने से निकालके ऐक्टिंग के जरिए शरीर के हर जर्रे से चेहरे के हावभाव से टपक रहे थे। हमे पेन फिल हो रहा था। आदमी मे दम था। जो किसीके सामने शायद न निकले, वो आज रात के 1 बजे 2 बजे, इंडिपेंडेंस मोल के सामने खुले आसमान के नीचे तीन यारों के बीच निकाल रहा था। इन दोनों को समय का अंदाज नहीं था, लेकिन मुजे था। आखरी ट्रेन 12:46 को थी। मैने जान बुझ के ट्रेन जाने दी, ईंटर्वीन नहीं किया। आज पंछियों को सांस लेने दी जाए। अमित भाई बताया रहे थे की लड़कों के लिए, आदमी के लिए कोई किटी पार्टी नहीं होती, क्या आदमी पे बंद कमरे में घर के अंदर जुल्म नहीं होता? आदमी की रूह से किसिने पूछा? की क्या क्या हुआ? या फिर यही बोल दिया की मर्द को दर्द नहीं होता। उसको किसिने पूछा की तुम्हारी विश क्या है? क्यों आदमी झुकके लड़की को प्रोपॉज करता है? ऐसा क्यू? क्या आदमी अपनी बात अगर पार्टनर न सुने, क्युकी उसको तो अपनी ही विश की पड़ी है, और मबाप भी न सुने, तो क्या वो लड़कों की किटी पार्टी शुरू करता है? क्यू नहीं कर सकता? लड़के अपना अपना बात क्यूनहीं कर सकते किटी पार्टी में? अपने पार्टनर की बुराई क्यू नहीं कर सकते? क्यू एक लड़की अपनी मा से अपने पार्टनर के बारे में मन चाहे वो गाली देके बात कर सकती है, पर एक लड़का आदमी अपने बाप से मन चले वो गाली देके अपने पार्टनर के बार में बात नहीं कर सकता? एसा क्या है जो अंदर से कुबड़ी कुरूप, दिल से कुरूप , सोच से कुरूप लड़की की हर बात को समाज इसलिए स्वीकार करता है की वो बाहर से सुंदर और मीठी है। और एक अंदर से दिलका साफ मन से नैतिक मूल्य की मूर्ति वाला आदमी भी बाहर से हर जिम्मेदारी उठाने के बाद भी, उसे उसकी बात प्रूव करनी पड़ती है, और हमेशा शक के दायरे मे रहता है। ये क्या पागलपन है, समाज का। जो मजबूर कर दे बुद्धिजीवी कर्मठ आदमी को की वो अब संभालके चले, क्युकी सामने हथियार इतने ज्यादा है, और ग्रीड इतनी बड़ी की हथियारों का दुरुपयोग करते आज कल की चांडालों को देर नहीं लगती। और क्यू न करे, मम्मा ने चालाक जो बनाना है उसे, और पिताजी को तो चाहिए ही था के बिना कुछ खर्च कीये बेटी चाँद पहोच जाए, और इतना ही नहीं, बेटी चाँद को कब्जे मे भी कर ले, चाँद पे उसका राज हो, चाहे ले जाने वाले को हज़्बन्ड कहदों या मजदूर। ये सब बातें करते करते, ये भी बातें निकली की क्या किया जाए? क्या हमारी सैम्पल स्पेस सही है? हमारे तजुर्बों की सैम्पल स्पेस? गौसीयन डिस्ट्रब्यूशन क्या कहता है? सभी ऐसी ही है? सभी ऐसी नहीं है? क्या सब depends है? आखिर बात क्या है? कोई खुश है तो क्या इसका मतलब ये है की उसको बंदी सही मिली? क्या उसमे संभावना नहीं है गलत करने की? और अगर है तो वो क्यू गलत नहीं करेगी, और करेगी तो कब करेगी? क्या है पूरा dynamics? क्या आज आदमी डिसेबलड़ है औरत तो डिकोड करने में? क्यू? क्या है कमजोरी? सही कपल किसे कहा जाए? इतर बातें। तीनों खुलके मजे से इस संजीदा पहेलियों को सुलझाने के लिए अपने अपने एकदम स्पर्श कर देने वाले तजुर्बे बताया रहे थे, और मशवरा चल रहा था। अपने अपने फंडे दे रहे थे, की भगवान ने दी हुई ये अनमोल जिंदगी को कैसे किसी घटिया पार्टनर से बचा लिया जाए। और कैसे जी लिया जाए। बाते बहोत संजीदगी वाली थी, लिकीन जैसे चार यार बैठे थे, हम तीन और bagpiper। पूरा फिलोसोफिकल माहोल था, तीनों दमदार फलसुफा झाड रहे थे, फरक इतना था, की सतही फिलासफी नहीं थी, तीनों के दिल दहलानेवाले तजुर्बों से एक एक individual mind अपनी अपनी दिक्कत और अपना solution और उससे जुड़ी हुई फिलासफी दे रहा था, और सुन भी रहा था। जैसे mature शायर की शायरी मे वजन होता है, वैसे आज बातों में दम था। हर बात के पीछे तीन में से एक अस्तित्व हर बात के पीछे पूरा का पूरा खड़ा था। 3 बज रहे थे, हम इसी बातों में lyft बुक कीये। अब सोने की देर थी बस, कल सुबह 8 बजे उठना था, और 3 बज चुके थे। यही पे रोकना पड़ेगा conversation, नींद भी जरूरी है। तीसरा किस्सा यहीपे खत हो रहा था। लेकिन इस बार भी खुदा को ये मंजूर नहीं था। इस बार मेरी पूरी जिंदगी की सबसे दमदार एंट्री इस्लाम की, reinforcing एंट्री, वो बस अब होने वाली थी। आगेका एक घंटा विकास सो गया था lyft मे कुछ ही देर के बाद, पर मे और अमित हक्के बकके रह गए, एक अनजान पाकिस्तानी की बातों से, अब्दुल भाईजान की बातों से।
कहानी ४
में शायद 6 साल का था, और पहला प्यार इबादत से हुआ था। लड़की का नाम याद नहीं। सामने के बिलिंग में एक इस्लाम फेमिली रहती थी। में 6 साल का था, और शायद वो 7 साल की। पिताजी और माताजी कहीं बाहर जाने वाले थे तो इसबार मा ने बोला था के सामने जो आंटी है उनके घर चले जाना, अगर थक जाओ, पानी पीना है या कुछ नाश्ता करना है तो। जब तक हम वापस ना आ जाए, तब तक वही रहो। खेलते खेलते में थक गया था, प्यास लागि, धूप थी, सोचा जाता हु आंटी के घर। दरवाजा खुला, कुछ पकने की खुशबू आ रही थी। आंटी ने बताया अंदर बेडरूम मे खेलों आप। उनकी बेटी को मैने कभी इबादत के लिबास में नहीं देखा था। लेकिन अब की बार जैसे ही बेडरूम में जा रहा था, मैने देखा नन्ही सी 7 साल की लड़की इतनी खूबसूरत, इस्लाम के सफ़ेद लीबास में इबादत कर रही थी, जैसे देखते ही 3-4 चीजों से प्यार हो गया, इस्लाम, उर्दू, वो लड़की, उसकी तहज़ीब , उसकी इबादत। खैर मे कुछ बोला नहीं, चुपचाप देखा वो क्या कर रही है। कुछ नहीं कर रही थी। इबादत कुछ 2-5 मिनट चली होगी। इबादत से निकलते उसने मुझसे माफी मांगी थी, की वो इबादत में थी तो बात नहीं कर पाई, ध्यान नहीं दे पाई। फिर हम लोग खेलने लगे। फिर क्या हुआ याद नहीं, पर उसकी वो इबादत वाली अदा, आज भी कहीं गहरे एकदम वैसी की वैसी पड़ी है, वो इमेज किलर थी। उसके बाद मे शायद वो कभी इतनी पसंद नहीं आई, पर वो दो मोमेंट ने इस्लाम का झटका दे दिया था मुझे। आगे चलते कहीं वेद उपनिषद के चक्कर में, मुलाकात हो गई सूफ़ीज़म से, और मेरी पर्सनल डायरी में सबसे ऊपर का दरज्जा सूफीजम का है। में वेद को रॉक एण्ड रोल का दरज्जा देता हु। एसा जबरजस्त लिटरचर मैने कभी नहीं पढ़ा और में गारंटी के साथ कह सकता हु की कही नहीं मिल सकता। ये ultimate है। लेकिन प्रैक्टिकल में देखा जाए तो जो इस्लाम और वेद उपनिषद के मेरेज से जो जबरजस्त outcome निकला वो मेरे हिसाब से मस्त की दुनिया में, mystic की दुनिया में तहेलका है अगर उसे ठीक से जाना जाए । Mystic का आखरी stable और ultimate form है सूफिसम। इस डिस्कवरी के साथ जैसे सूफिसम ओर उसके पीछे के इस्लाम ने मुझे 25 साल बाद फिरसे जीत ही लिया। उर्दू भी अपने आपमे कहर है। उर्दू के प्यार में कहीं चलते, इस्लाम के जज्बे से में वाकिफ था। कमाल है वो जुबान, तो सोचो उसके पीछे का इस्लाम कितना कमाल होगा। कहीं स्कूल में एक लड़की थी बड़ी स्मार्ट, अव्वल नंबर, वो मुस्लिम थी, उसकी तहज़ीब भी कमाल थी। तीर की तरह छु लेने वाली वो तहज़ीब पीछे के brilliant इस्लाम की तरफ इशारा कर रही थी। ये तीन बड़े रीज़न थे जो आज भी इस दौर में, मेरे अंदर कहीं इस्लाम को हमेशा हाई रिगार्ड में रख रहे थे। कुछ बात तो थी। आते है वापस, आज हम तीनों बैठे है, lyft का इंतज़ार करते, एक lyft कैन्सल होने के बाद दूसरी lyft 5 मिनट में आ रही थी। आतेही दरवाजा खुला भाईजान से बात शुरू हुई। क्युकी हम पिछले 4 घंटे से खुले आसमान के नीचे खुले दिल से बाते कर रहे थे, अभी कोई guards ऑन नहीं थे। एक दो मिनिट मे हमने जाना अब्दुल पाकिस्तान से है, और lyft कैन्सल करके, उनको सीधा पैसा देनेका फैसला किया। अब्दुल भाई ने कैन्सल की, और हम बातें करते करते आगे बढ़े, रास्ता 40 मिनट का था। अब्दुल की पहली बात जो मुझे छु गई वो थी थे ब्रिल्यन्ट “आल्हामदुलीलाह”। जैसे गुजरात में होता है जय श्री कृष्ण, कुछ वैसे है अब्दुल बात बात में कही बोल रहे थे आलहमदुलीलाह। में आवाक था। ये मंत्र है, बिल्कुल। अब्दुल ये जानता हो या नहीं, वो religious जिंदगी जी रहा है, दरअसल में, हर कुछ मिनट पे मंत्र आ रहा था, इसका एक पक्का मीनिंग था के ये बंदा अल्लाह के बहोत करीब है। हर किसी बात में जब बाड़ा उतार या चड़ाव आ रहा था, अब्दुल के मुह से आल्हामदुलीलाह अपने आप आ रहा था। ये रीलिजन की ताकत होती है । जानके भी में नहीं कर पाता, और वो ना जाने हुए भी अल्लाह से एकदम सट के जी रहा था। अब्दुल को अमित और मैने बताया हमारे पझल के बारें में। फिर हम सुनते गए, बस सुनते गए, बस सुनते गए, एक देसी पाकिस्तानी 29 साल के, लड़के से। बिल्कुल में जैसे मूल्यांकन करके बेठा था के ये बंदा, अल्लाह के इतने करीब ही है बेशक, कुछ वैसे ही, हमने अपने सामने हमसे उम्र मे छोटे बंदे को इतनी ज्यादा तहज़ीब से वो बाते कहते सुना जो बस हम सुनते ही गए। पूरी रात हम तीन बहस कर रहे थे। लेकिन अब्दुल के सामेन बहस की गुंजाइश नहीं थी। वो बंदा शायद अल्लाह के इतने करीब था, अमित और मे बस सुनते ही रहे उसको, वो बताता ही रहा, पूरे होश में, पूरे दिल से, अपना समझके, जैसे पुराना स्कूल का दोस्त हो वैसे, पूरी जिम्मेदारी के साथ, आल्हामदुलीलाह के साथ, अल्लाह के साथ वो जुड़ा हुआ हो जैसे, हमको ऐसी बातें बताया जो हम बस प्रोसेस कर रहे थे और हर बार ऐसा लगा बंदा क्या बोल रहा है!!! अब्दुल आईआईटी से नहीं था। अब्दुल इस्लाम का पक्का था। उसकी बात में इबादत दिख रही थी। उसके लिए हम पराए नहीं थे। उसकी हर बात जो उसके जर्रे जर्रे से निकाल रही थी, उसमे सूफिसम का टच था, इस्लाम की इबादत, इस्लामक लिबास, ये बंदा अपनी एक एक शब्द से इस्लाम का जैसे नमूना हो। उसने कुरान के कुछ छोटे मोठे राज बताए। में पीछे बैठा था, मैने उसका चेहरा नहीं देखा था। जब वो पीछे मुड़ा तब देखा भाई स्टड लगता है । फिर भी ये बात सेकन्डेरी थी, जो सबसे जबरजस्त बात लागि की इस्लाम का जो न्यूज मे पढ़ा हुआ पोलिटिकल वर्ज़न है, उसको वो अनजाने में चुनौती दे रहा था। अब्दुल मेरे लिए इस्लाम के रुतबे को रूबरू करवाता हुआ चौथा संस्करण था। चौथी कहानी खत्म हुई। ओर इस बार शायद खुदा को मजूर था की 4 बजे हम सो जाए। मैने अब्दुल को तगड़ी टिप दी। हाथ मिलाया । अब्दुल जो 29 साल का पाकिस्तानी है उसने हम तीनों को कहा कभी भी हम लोग उसे कान्टैक्ट कर सकते है और वो अपने बुरे दौर के तजुर्बों से जो सिख और जितना भी इस्लाम उसने अंदर भरा है, वो सब लगा के वो जो कुछ कर सकता है बताया सकता है वो बताएगा । में रूम मे गया, थक गया था, सो गया लेकिन एक बार तो खयाल आगया, अब्दुल यही अब्दुल बिल्कुल न होता अगर उसके मुह पे आल्हामदुलीलाह न होता, अगर उसका जहेन इतना पाक न होता। मेरी अमित से बात नहीं हुई इसके बाद, पर में बहोत हाई कान्फिडन्स से बोल सकता हु की अमित केलिए भी इस्लाम का मतलब बदल गया अब्दुल से मिलने के बाद। में चैन की नींद सो गया, क्युकी पैर इतने दर्द कर रहे थे की क्या बताऊ।