पी रहा हु,
मेच्योरिटी कि दवाई ,
कई दशकों से !
सीख रहा हु,
कब है बढाने,
कब है घटाने,
अपने कर्तव्यों के मुल्य !
चुप खड़ा,
देख रहा हु,
आज़ाद हवा में,
उड़ रहे,
मेरे जलते अधिकारों
का धुआं !
रख आया हु,
संग्रहालय में,
अपनी,
भावनाओ का संविधान !
एहसासकर लेता हु,
खुली हवा में,
दिनभर
मेरी पुराने लालटेन कि
कांपती लौ का,
जलना बुझना
और
बुझ बुझ कर
फिर भी
जलते रहना!
अब भी
रगो में
योद्धा, संग्राम, निस्चय
और, जय है
पर,
कलियुग में
रंगभूमि कहाँ
ये तो बाज़ार है
तामस का बाज़ार